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मनुष्यात्माओं की 3 खिड़कियां-मन्सा,वाचः,कर्मणा

मनुष्यात्माओं की 3 खिड़कियां-मन्सा,वाचः,कर्मणा

हमें मन्सा-वाचा-कर्मणा बहुत-बहुत ध्यान रखना है, कभी भी तुम्हें क्रोध नहीं आना चाहिए। क्रोध पहले मन्सा में आता फिर वाचा और कर्मणा में भी आ जाता है। यह तीन खिड़कियाँ हैं इसलिए GOD समझाते हैं-मीठे बच्चे, वाचा अधिक नहीं चलाओ, शान्त में रहो, वाचा में आये तो कर्मणा में आ जायेगा। गुस्सा पहले मन्सा में आता है फिर वाचा-कर्मणा में आता है। तीनों खिड़कियों से निकलता है। पहले मन्सा में आयेगा। दुनिया वाले तो एक-दो को दु:ख देते रहते हैं, लड़ते-झगड़ते रहते हैं। तुमको तो कोई को भी दु:ख नहीं देना है। ख्याल भी नहीं आना चाहिए। साइलेन्स में रहना बड़ा अच्छा है।

जादूगर की बत्ती सुना है? अलाउद्दीन की बत्ती भी गाया जाता है। अलाउद्दीन की बत्ती वा जादूगर की बत्ती क्या-क्या दिखाती है! वैकुण्ठ, स्वर्ग, सुखधाम। बत्ती को प्रकाश कहा जाता है। अभी तो अन्धियारा है ना।

यहाँ बाम्बे को कहते हैं गेट-वे ऑफ इन्डिया। स्टीमर पहले बाम्बे में ही आते हैं। देहली में भी इन्डिया गेट है। अब अपना यह है गेट ऑफ मुक्ति जीवनमुक्ति।

दो गेट्स हैं ना। हमेशा गेट दो होते हैं इन और आउट। एक से आना, दूसरे से जाना। यह भी ऐसे है-हम नई दुनिया में आते हैं फिर पुरानी दुनिया से बाहर निकल अपने घर चले जाते हैं। परन्तु वापस आपेही तो हम जा नहीं सकते क्योंकि घर को भूल गये हैं, गाइड चाहिए। वह भी हमको मिला है जो रास्ता बताते हैं। बच्चे जानते हैं बाबा हमको मुक्ति-जीवनमुक्ति, शान्ति और सुख का रास्ता बताते हैं। तो गेट ऑफ शान्तिधाम सुखधाम लिखें। विचार सागर मंथन करना होता है ना। बहुत ख्यालात चलते हैं-मुक्ति-जीवनमुक्ति किसको कहा जाता है, वह भी कोई को पता नहीं है। शान्ति और सुख तो सभी चाहते हैं।

शान्ति भी हो और धन दौलत भी हो। वह तो होता ही है सतयुग में। तो नाम लिख दें-गेट ऑफ शान्तिधाम और सुखधाम अथवा गेट ऑफ प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी। यह तो अच्छे अक्षर हैं। तीनों ही यहाँ नहीं हैं। तो इस पर फिर समझाना भी पड़े। नई दुनिया में यह सब था।

नई दुनिया की स्थापना करने वाला है पतित-पावन, गाड फादर। तो जरूर हमको इस पुरानी दुनिया से निकल घर जाना पड़े। तो यह गेट हुआ ना-प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी का।

करनकरावनहार ऊपरवाला गॉड,भगवान है ना।

वर्तमान समय मंसा-वाचा-कर्मणा सबसे अच्छा कर्म तो एक ही है-अंधों की लाठी बनना। गाते भी हैं – हे प्रभू अंधों की लाठी। सब अन्धे ही अन्धे हैं। तो बाप GOD आकर लाठी बनते हैं। ज्ञान का तीसरा नेत्र देते हैं।

आत्माओं का बाप परमपिता परमात्मा पतित-पावन है। तुम उस बाप को याद करो तो सुखधाम चले जायेंगे। यह है हेल, इनको हेविन नहीं कहेंगे। हेविन में है ही एक धर्म। भारत स्वर्ग था, दूसरा कोई धर्म नहीं था। यह सिर्फ याद करें, यह भी मनमनाभव है। हम स्वर्ग में सारे विश्व के मालिक थे-इतना भी याद नहीं पड़ता है!

GOD को जानते ही नहीं। दु:ख हर्ता सुख कर्ता तो परमपिता परमात्मा है ना। वह है ही दु:ख हरने वाला। वह फिर गंगा में जाकर डुबकी लगाते हैं। समझते हैं गंगा पतित-पावनी है। सतयुग में गंगा को दु:ख हरनी पाप कटनी नहीं कहेंगे। साधू सन्त आदि सब जाकर नदियों के किनारे बैठते हैं।

GOD आकर स्वर्ग का अथवा सुख-शान्ति का गेट बतलाते हैं। बच्चों को ही बतलाते हैं। बच्चों को कहते हैं तुम भी औरों को बतलाओ। प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी होती है स्वर्ग में। वहाँ कैसे जाते हैं, वह समझना है। यह महाभारत लड़ाई भी गेट खोलती है।

सवेरे विचार सागर मंथन करने से मक्खन निकलता है। अच्छी राय निकलती है,  विचार करना चाहिए, कोई का अच्छा विचार भी निकलता है। अब तुम समझते हो पतित को पावन बनाना माना नर्कवासी से स्वर्गवासी बनाना। देवतायें पावन हैं, तब तो उनके आगे माथा टेकते हैं। तुम अभी किसको माथा नहीं टेक सकते हो, कायदा नहीं। बाकी युक्ति से चलना होता है। साधू लोग अपने को ऊंच पवित्र समझते हैं, औरों को अपवित्र नींच समझते हैं। बड़ी युक्तियां चाहिए। जब मौत सिर पर आता है तो सभी भगवान का नाम लेते हैं। आजकल इत़फाक तो बहुत होते रहेंगे। आहिस्ते-आहिस्ते आग फैलती है। आग शुरू होगी विलायत से फिर आहिस्ते-आहिस्ते सारी दुनिया जल जाये। अलाउद्दीन की बत्ती भी मशहूर है ना! नोट ऐसा करने से कारून का खजाना मिल जाता है। है भी बरोबर। तुम जानते हो अल्लाह अवलदीन झट इशारे से साक्षात्कार कराते हैं।  तुमको एम ऑब्जेक्ट का साक्षात्कार तो होता ही है फिर तुम बाबा को, स्वर्ग को बहुत याद करेंगे। अंत की सभी सीन सीनरी देख सकेंगे। बड़ी मंजिल है। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना, मासी का घर नहीं है। बहुत मेहनत है।

अपने को आत्मा समझने से फिर देह का भान ही नहीं रहेगा।  अपने नाम-रूप से भी न्यारा होना है तो फिर दूसरे के नाम-रूप को याद करने से क्या हालत होगी!

प्राचीन भारत का योग जो है हम आत्मा हैं, परमात्मा में लीन होना है। लीन कोई होते नहीं हैं। हैं ब्रह्म ज्ञानी। वायुमण्डल बड़ा शान्त रहता है, सन्नाटा हो जाता है। सन्नाटा भी उनको भासेगा जो ज्ञान मार्ग में होंगे, शान्त में रहने वाले होंगे।  योग से ही सारा हिसाब-किताब चुक्तू करना है। ज्ञान से थोड़ेही चुक्तू होता है। हिसाब-किताब चुक्तू होगा याद से। कर्मभोग याद से चुक्तू होगा। यह है गुप्त।

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