Sunday , July 5 2020

WORLD's FASTEST GROWING POSITIVE NEWS PORTAL

Latest
Home / Spritual / सुखमय जीवन Happy life बनाने के लिये 4 मंत्र- श्री रविशंकर जी

सुखमय जीवन Happy life बनाने के लिये 4 मंत्र- श्री रविशंकर जी

सुखमय जीवन Happy life बनाने के लिये 4 मंत्र- श्री रविशंकर जी

पहला रत्न : “माफी”
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।Happy life

दूसरा रत्न : “भूल जाना”
अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।

तीसरा रत्न : “विश्वास”
हमेशा अपनी मेहनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना । यही सफलता का सूत्र है ।

चौथा रत्न : “वैराग्य”
हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निशिचत हि हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए बिना लिप्त हुवे जीवन का आनंद लेना । वर्तमान में जीना।

बहिर्मुखी(Extrovert) का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति, जिसने निरंतर बहिर्मुखता को साधा है। निरंतर! धन खोजा कभी, कभी यश खोजा, कभी वासना, और चक्कर लेता रहा उन्हीं के। तो धीरे-धीरे, धीरे-धीरे मन की वह जो अंतर्मुखता की धारणा है, वह क्षीण होती चली जाती है।

अंतर्मुखी(Introvert) जो द्वार है, वह निरंतर बंद रहने से जंग खा जाता है। फिर उसे एकदम से खोला नहीं जा सकता। जैसे घर में कोई एक दरवाजे को दो-चार-दस साल बंद रखे, तो फिर एकदम से खोलना मुश्किल हो जाए। वह चूं-चर्राहट करे, बहुत आवाज करे; मुश्किल पड़े; तोड़ना पड़े। लेकिन जिस दरवाजे को हम रोज खोलते हैं, वह भी बीस साल पुराना होगा, लेकिन वह खुलने में सुगमता पाता है। जो हम करते रहते हैं निरंतर, वह सुगम हो जाता है।

हम सभी बहिर्मुख जीवन में जीते हैं। सारी शिक्षा, सारा समाज, परिवार, जगत बहिर्मुखी होने के लिए तैयारी करवाता है। एक-एक बच्चे को हम तैयार करते हैं, शिक्षा देते हैं। ध्यान की कभी नहीं देते, प्रतियोगिता की देते हैं, कांपिटीशन की देते हैं; एंबीशन, महत्वाकांक्षा की देते हैं। शांति की कभी नहीं देते, मौन की कभी नहीं देते, शब्द की जरूर देते हैं। शब्द सिखाते हैं हम हर बच्चे को, मौन किसी बच्चे को नहीं सिखाते। और शब्द में जो जितना कुशल हो जाए, संभव है कि उतना सफल हो जाए। मौन जो रह जाए, हो सकता है जिंदगी में हार जाए, असफल हो जाए।

पूरी जिंदगी हम बाहर की तरफ जीते हैं। सारा शिक्षण, सारी सफलता, सारा इंतजाम जगत का बहिर्मुखी है। और हम उसमें ही दौड़ते चले जाते हैं। बच्चे आते हैं, हम पागलों की दौड़ में हम उनको भी सम्मिलित कर लेते हैं। जैसे किसी पागलखाने में हम एक बच्चे को भेज दें। बहुत संभावना है कि बच्चा पागल हो जाएगा। पागलों के साथ रहेगा, पागल अपने ढंग सिखा देंगे। और अगर बच्चे न सीखें ढंग, तो मां-बाप नाराज होते हैं कि हम तुम्हें अपने ढंग सिखा रहे हैं और तुम सीखते नहीं! और मां-बाप कभी नहीं सोचते कि उनके ढंग से वे खुद कहां पहुंचे हैं! कहीं नहीं पहुंचे हैं। लेकिन बड़ा आग्रह है कि अपने ढंग बच्चों पर थोप दें।

सब पीढ़ियां अपने बच्चों को बहिर्मुखी कर जाती हैं। और बच्चे भी पिछले जन्म से बहिर्मुखी होकर आते हैं। ध्यान रहे, जो बच्चा आपके घर में पैदा होता है, वह थोड़ी ही देर पहले बूढ़ा रह चुका है। एकदम बच्चा तो इस जमीन पर कोई पैदा होता नहीं। बूढ़े पैदा होते हैं। वह तो बहिर्मुखी होने की सारी यात्रा लेकर आ ही रहे हैं। फिर दुबारा चारों तरफ से दबाव पड़ता है उनके बहिर्मुखी होने का। ऐसा जन्मों-जन्मों तक चलता है।

इस जन्मों-जन्मों की यात्रा में अगर धीरे-धीरे सौ में से निन्यानबे आदमी बहिर्मुखी हो जाते हैं, तो आश्चर्य नहीं है। आश्चर्य तो यह है कि कुछ लोग फिर भी अंतर्मुखी रह जाते हैं, हमारी सारी व्यवस्था के बावजूद, हमारे बावजूद! हमारे सारे इंतजाम को तोड़कर भी कुछ लोग भाग निकलते हैं।

यह बहिर्मुखता जीवन में उपयोगी है, इसलिए हम सीख लेते हैं; युटिलिटेरियन है। अंतर्मुखी आदमी जीवन में असफल हो जाता है। आप जानते हैं, हम अंतर्मुखी आदमी को कहते हैं, बुद्धू। लेकिन कभी समझा आपने, सोचा कि यह बुद्धू शब्द जो है बुद्ध से बना है!

असल में जब पहली दफा बुद्ध बैठ गए सब घर-द्वार छोड़कर, तो जो बुद्धिमान थे गांव में, उन्होंने कहा, बुद्धू निकला! बुद्ध को। क्योंकि बुद्धूपन तो था ही हम सबकी आंखों में, हम सबकी दुनिया में, हिसाब में। सुंदर स्त्रियां थीं, जैसी कि किसी आदमी को शायद ही कभी मिली हों। छोड़कर भाग गया! यह आदमी बुद्धू है। साम्राज्य था। हम जिंदगीभर खोजते हैं, और नहीं पाते। नाक रगड़ते रहते हैं पत्थरों पर और नहीं पहुंच पाते। और इस आदमी को जन्म से मिला था साम्राज्य। सिंहासन पर बैठने का क्षण आता था और भाग खड़ा हुआ! बुद्धू है।

बुद्ध को तो सीधा सामने किसी ने भी नहीं कहा होगा। लेकिन जब कोई और आदमी बुद्ध की तरह झाड़ के नीचे हाथ बांधकर बैठने लगा, तो उन्होंने कहा, यह भी बुद्धू हुआ; यह भी बुद्ध जैसा हुआ!

यह जो हमारा जगत है, वहां केवल बहिर्मुखता उपयोगी मालूम पड़ती है, अंतर्मुखी का कोई मूल्य नहीं है। कोई मूल्य नहीं है। लेकिन जीवन की गहराइयों में अंतर्मुखता का ही मूल्य है।

बुद्धू हम जिनको कहते हैं, वे हमको बुद्धू मानते हैं। बुद्ध से हम पूछने जाएंगे, तो वे हम को अज्ञानी मानते हैं। वे मानते हैं कि तुम सब नासमझ हो। क्योंकि तुम जो कर रहे हो, उससे कहीं पहुंचोगे नहीं। और जिन चीजों में तुम मूल्य देख रहे हो, उनमें कोई भी मूल्य नहीं है। अगर हार गए, तब तो हारोगे ही; अगर जीत गए, तो भी मुश्किल में पड़ोगे।

जिंदगी बहुत कंपनसेशन करती है, बहुत हैरानी के। जो लोग जिंदगी में असफल रहते हैं, उनको जिंदगी में तकलीफ होती है। असफलता की पीड़ा, अहंकार को चोट लगती है। जो लोग सफल हो जाते हैं, उनको मरते वक्त भारी पीड़ा होती है। बराबर हो जाता है दोनों का पलड़ा। मरते वक्त सफल आदमी को भारी पीड़ा होती है कि सब किया-कराया गया!

मैंने सुना है, एक आदमी बड़ा व्यवसायी है। लेकिन धीरे-धीरे कुछ दिन से पता चलता है कि उसका मुनीम पैसे हड़प रहा है। धीरे-धीरे बात पक्की हो गई, प्रमाण हाथ लग गए, तो उस मालिक ने उस मुनीम को एक दिन बुलाया और कहा कि तुम्हारी तनख्वाह कितनी है? उस मुनीम ने कहा कि पंद्रह सौ रुपए महीना। उस मालिक ने कहा, मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं। और आज से तुम्हारी तनख्वाह करते हैं दो हजार। फिर कहा, नहीं-नहीं-नहीं, दो हजार तो कम ही होगा। तुम्हारा काम देखते हुए ढाई हजार करना ठीक होगा। मुनीम तो एकदम हैरानी से खड़ा हो गया। उसने कहा, क्या कह रहे हैं आप! एकदम हजार रुपए की बढ़ती! छाती जोर से धड़कने लगी। मालिक ने कहा कि इतने से तुम खुश हो गए? मैंने तो सोचा था कि तीन हजार… । उस मुनीम ने हाथ पकड़ लिए और कहा, धन्यवाद! मालिक ने कहा कि एक आखिरी बात और कि आज से तुम्हारी नौकरी खतम। उस आदमी ने कहा, आप क्या कह रहे हैं? अगर नौकरी ही खतम करनी थी, तो तीन हजार तक तनख्वाह क्यों बढ़ाई? उस मालिक ने कहा, अब तुम जरा ज्यादा परेशान रहोगे। पंद्रह सौ की नौकरी नहीं छूट रही है, तीन हजार की छूट रही है! अब जाओ।

सफल आदमी मरते वक्त पाता है कि तीन हजार की नौकरी गई। मुश्किल से तो राष्ट्रपति हो पाए थे, वह गया मामला! चपरासी मरते वक्त इतनी तकलीफ नहीं पाता। चपरासी जिंदा में बहुत तकलीफ पाता है, कि सिर्फ चपरासी! राष्ट्रपति मरते वक्त तकलीफ पाता है कि राष्ट्रपति हुए और मरे। तीन हजार तनख्वाह मिली, एंड फायर्ड!

जिंदगी बराबर कर देती है चपरासी और राष्ट्रपति को। चपरासी को जिंदगी में तकलीफ मिल जाती है, राष्ट्रपति को मरने में। अगर हिसाब लगाने जाएं, तो कुछ फर्क नहीं रहता। पलड़े बराबर हो जाते हैं।

बुद्ध जैसा आदमी कहेगा, तुम यह सब पाकर करोगे क्या? आखिर में एकदम हटा दिए जाओगे सबसे। और जो चीज छीन ही ली जानी हैं, उन्हें हम खुद छोड़ देते हैं अपनी मौज से। जो स्त्रियां छिन जाएंगी, जो धन छिन जाएगा, वह हम छोड़ देते हैं अपनी मौज से। हम मालिक हैं अपने। तुम गुलाम हो। तुम तड़पते हुए मरोगे; हम खुशी से जिंदा रहेंगे। और मौत हमसे कुछ भी न छीन पाएगी। मौत हमारे पास आकर थक जाएगी और हार जाएगी और मुश्किल में पड़ जाएगी कि क्या छीनो! क्योंकि हम सब पहले ही दे चुके, जो मौत हमसे ले लेती।

इस पृथ्वी पर बुद्धिमान लोगों ने वह सब खुद ही छोड़ दिया है, जो मौत उनसे छीन लेती है। और जिस व्यक्ति को मौत का ख्याल है, वह अंतर्मुखी हो जाएगा; और जिसको जिंदगी का ख्याल है, वह बहिर्मुखी हो जाएगा। जिंदगी में बहिर्मुखता उपयोगी है। मौत को ध्यान में रखिएगा, तो अंतर्मुखता उपयोगी है।

मनुष्यात्माओं की 3 खिड़कियां-मन्सा,वाचः,कर्मणा

http://www.bbcworldnews.com

Check Also

मनुष्यात्माओं की 3 खिड़कियां-मन्सा,वाचः,कर्मणा

मनुष्यात्माओं की 3 खिड़कियां-मन्सा,वाचः,कर्मणा हमें मन्सा-वाचा-कर्मणा बहुत-बहुत ध्यान रखना है, कभी भी तुम्हें क्रोध नहीं …

Leave a Reply