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“मैं”ही रावण, अहंकार रूपी मैं पन को जला मनाए सच्ची दशहरा

“मैं”ही रावण, अहंकार रूपी मैं पन को जला कर मनाए सच्ची दशहरा……

Newsanant:- दोस्तों आप सभी ने अपने जीवन में भी कभी न कभी मैं मैं जरूर किया होगा।

मैं ने ऐसा किया, अगर मैं नहीं होता तो..

फलाना फलाना

अब आइए इस बकरे की मैं मैं को मानव ने अपने जीवन में जगह कैसे दी जाने।

मनुष्य समाज में अपनी साख बनाने के लिए इस मैं शब्द को प्रायः प्रयोग में लाता है।

और स्पष्ट रूप से जानने के लिए इस उदाहरण से समझ सकते है कि कोई व्यक्ति यदि किसी ऊंचे पद पर आसीन होता है तो वह उसी नशे में अपने पद के अंहकार में रॉब दिखाता है।

और कोई धनवान को अपने धन का रूपवान को अपने रूप का,ज्ञानवान को अपने ज्ञान का अंहकार जरूर होता है।

यदि कहीं भी उसके मैं पन को ठेस पहुंची तो उसका अंहकार जागृत हो जाता है।

आज का मानव विज्ञान के साधनों से सम्पन्न होकर स्वयं को एक दूसरे से श्रेष्ठ समझता है।

बेजुबान जानवर मैं मैं करने वाले बकरे की बलि के बजाय यदि मनुष्य मैं पन की बलि चढ़ाएं।

और रावण के पुतले को जलाने के बजाए

“मैं”ही रावण, अहंकार रूपी मैं पन को जला कर मनाए सच्ची दशहरा

यही वास्तविक सच्ची सच्ची विजया दशमी होगी।

 

“मैं”ही रावण, अहंकार रूपी मैं पन को जला कर मनाए सच्ची दशहरा……

Newsanant:- दोस्तों आप सभी ने अपने जीवन में भी कभी न कभी मैं मैं

“मैं”ही रावण, अहंकार रूपी मैं पन को जला कर मनाए सच्ची दशहरा……

Newsanant:- दोस्तों आप सभी ने अपने जीवन में भी कभी न कभी मैं मैं

“मैं”ही रावण, अहंकार रूपी मैं पन को जला कर मनाए सच्ची दशहरा……

Newsanant:- दोस्तों आप सभी ने अपने जीवन में भी कभी न कभी मैं मैं

“मैं”ही रावण, अहंकार रूपी मैं पन को जला कर मनाए सच्ची दशहरा……

http://Www.bbcworld.com

Newsanant:- दोस्तों आप सभी ने अपने जीवन में भी कभी न कभी मैं मैं

 

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