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श्रीमद भगवत गीता में वर्णित राजयोग द्वारा ईश्वर की सत्य पहचान

श्रीमद भगवत गीता में वर्णित राजयोग द्वारा ईश्वर की सत्य पहचान

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।।

अर्थात्- यह “राजयोग” विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है।। गीता2/9।।

सर्वशक्तिमान सर्वात्माओं के एकमात्र परमपिता सर्वेश्वर भगवान सदाशिव स्वयंभू निराकार परमात्मा ने साधारण मानवीय तन हिरण्यमय पुरूष जिसे सुत्रात्मा व प्रजापिता ब्रह्मा भी कहते है उस आदिदेव अथवा आदम के स्थूल तन का आधार लेकर जीवन की सर्व व सर्वोच्च प्रप्ति के लिए के लिए जो गीतों के अर्थ से ज्ञान की अतिगुह्य मर्म समझा कर स्वयं से एकाकार होने का जो योग सिखाया वही “राजयोग”
श्रीमद्भगवत गीता (अर्थात् श्रेष्ट ते श्रेष्ट मत स्वयं भगवान द्वारा गाया हुआ ज्ञान) कहलाया।
और देखिये आज तीनो का ही अद्भुत संयोग का दिन भी है। ज्ञान और योग के इन्ही रहस्यों को मानव कल्याण की दृष्टि से सहज राजयोग को और अति सहज करके सरल स्वरूपों में आत्मसात करने के लिए महर्षि पतंजली ने अष्टांगयोग के रूप में पतंजलीयोग सूत्र का निर्माण किया।
महर्षि पतंजलि ने योग को ‘चित्त की वृत्तियों के निरोध’ (योगः चित्तवृत्तिनिरोधः) के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने ‘योगसूत्र’ नाम से योगसूत्रों का एक संकलन किया जिसमें उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए अष्टांग योग (आठ अंगों वाले योग) का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग योग को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। योग के ये आठ अंग हैं:

1*यम, 2* नियम, 3* आसन, 4* प्राणायाम,
5* प्रत्याहार, 6* धारणा 7* ध्यान 8* समाधि

यह योग कोई एक दिन का रस्मअदायगी योग नहीं है बल्कि यह जीवन की संस्कृति व संस्कार है। जीवन का संगीत है परमपिता परमात्मा का परम उपहार है। इसे हमें जीवन में समाहित करना है ताकि जीवन में स्वास्थ्य सुख शान्ति आनन्द प्रेम और पवित्रता का सतत् संतुलन बना रहे।

यह राजयोग केवल शारीरिक प्रक्रिया ही नही है यह स्वयं से स्वयं में जुड़ने की प्रक्रिया है, स्वयं के अंतर्निहित अष्ट शक्तियों व सातो गुणों को डिस्कवर करने जगाने और उसमें रमण कर उसका जीवन में सदुपयोग करने का राजमार्ग है। यह राजयोग सर्व शक्तियो व सर्वगुणों के सागर परमात्मा से जुड़कर स्वयं को उन गुण ज्ञान व शक्तियों से सम्पन्न व भरपूर बनाने का महायोग है।

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरूषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।गीता8/8।।

अर्थात्- हे पार्थ (योग के पथिक ज्ञान को अर्जन करने वाले अर्जुन) यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यासरूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जानेवाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य “परम प्रकाश रूप दिव्य पुरूष को अरथात् ज्योति स्वरूप परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।

कविं पुराणमनुशासितार- मणोरणीयांसमनुस्मरेद्य:।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमस: परस्तात्।।
।। गीता 8/9।।

अर्थात्- जो पुरूष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, ज्योति स्वरूप, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्यस्वरूप, सूर्यके सदृश्य नित्य चेतन प्रकाशरूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है।

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्- स तं परं पुरूषमुपैति दिव्यम्।। गीता 8/10।।

वह भक्तयुक्त पुरूष अनतकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस* दिव्य स्वरूप परम पुरूष परमात्मा को ही प्राप्त होता है।

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरूध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मन: प्राण- मास्थितो योगधारणाम् ।।12।।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्रा व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ।।13।।

अर्थात्- सब इन्द्रियाँ के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राण को अच्छी तरह मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष ‘ऊँ’ इस एक अक्षर रूप ब्रह्म का चिन्तन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है , वह पुरुष परमगति को प्राप्त होता है ।। गीता 8/12-13।।

सर्वद्वाराणि = सब इन्द्रियों के द्वारों को ; संयम्य = रोककर अर्थात् इन्द्रियों को विषयों से हटाकर (तथा); मन: = मन को ; हृदि = हृद्देश में ; निरूध्य = स्थिर करके ; च = और ; आत्मन: = अपने ; प्राणम् = प्राण को ; मूर्न्धि = मस्तक में ; आधाय = स्थापन करके ; योगधारणाम् = योगधारणा में ; आस्थित: = स्थित हुआ ; य: = जो पुरुष ; इति = ऐसे (इस) ; एकाक्षरम् = एक अक्षर रूप ; ब्रह्म = ब्रह्म को ; व्याहरन् = उच्चारण करता हुआ (और उसके अर्थस्वरूप) ; माम् = मेरे को ; अनुस्मरन् = चिन्तन करता हुआ ; देहम् = शरीर को ; त्यजन् = त्याग कर ; प्रयाति = जाता है ; स: = वह पुरुष ; परमाम् = परम ; गतिम् = गति को ; याति = प्राप्त होता है

परिवर्तन के इस अभिष्ट संक्रमणकाल में यह वही अद्भुत महाकाल की पनरावृति का समय है जब स्वयं योगेश्वर परमपिता परमात्मा हम आत्माओं को गीता ज्ञान के माध्यम से पुनः राजयोग की शिक्षा दे रहे हैं परन्तु यह ज्ञान उन्ही को समझ में आयेगा जो उस परमपिता परमात्मा से निरन्तर योगयुक्त रहेगा

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः |
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः || गीता 8/14 ||

अनन्य-चेताः – अविचलित मन से; सततम् – सदैव; यः – जो; माम् – मुझ (ज्योति) को; स्मरति – स्मरण करता है; नित्यशः – नियमित रूप से; तस्य – उस; अहम् – मैं हूँ; सु-लभः – सुलभ, सरलता से प्राप्य; पार्थ – हे पृथापुत्र; नित्य – नियमित रूप से; युक्तस्य – लगे हुए; योगिनः – भक्त योगी आत्मा के लिए |

भावार्थ-हे अर्जुन! जो आत्मा (पुरूष) मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा ही नित निरन्तर मुझ निराकार पुरूषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूं |

आओ हम सभी इस योग दिवस पर सर्वशक्तिवान उस दिव्य ज्योति स्वरूप सदाशिव परमपिता परमात्मा जो श्रीगोपालकृष्ण का इष्ट गोपेश्वर है तो राम का इष्ट रामेश्वरम् है जिसे जिसस क्राइष्ट ने गाड इज लाईट कहा तो मक्का में जिसे नूर ऐ इलाही संगे अस़वद मक्का कहते हैं जो बुद्ध का धम्म अर्थात प्रकाश है उस शिव पिता से बुद्धयोग के द्वारा जुड़ कर दैनिक जीवन में शारिरिक मानसिक योग को समाहित कर जीवन के सुखमय संगीत से दिव्यता का वरण करें…और काम क्रोध लोभ मोह अहंकार रूपी ग्रहण से स्वयं को मुक्त कर परमानन्द का अनुभव करें… प्रकृति के अनुकूल जीवन जीयें प्राकृतिक तरीके से जीवन जीयें तभी सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया की कहावत को यथार्थता के धरातल पर उतार सकेंगे।।

करें योग… रहें निरोग…

BK Benibhai

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